वीडियो जानकारी:
शब्दयोग सत्संग
१८ फरवरी २०१४,
अद्वैत बोधस्थल, नॉएडा
प्रसंग:
क्या बोध, विचार, और कर्म तीनो एक ही गाड़ी के पहिये है?
जब हमें पता है सब कुछ स्वचालित है, सब कुछ स्वघटित है, फिर भी मन इतना क्यों सोचता है?
क्या विचार ही कर्म का आधार है?
विचारों का विश्लेषण कैसे करूँ?